Monday, April 2, 2012

ये कापुरुष कब तक नारी जीवन स्वेदना से खेलते रहेंगे , नारी जीवन को कबतक आत्महत्या की काली गर्द में फेंकते रहेंगे



ये कापुरुष कब तक नारी जीवन स्वेदना से खेलते रहेंगे , नारी जीवन को कबतक आत्महत्या की काली गर्द में फेंकते रहेंगे




पुरुष और लडकियों की मानसिकता में बहुत अंतर होता है ! पुरुष अपनी भडास को ओरतो पर चिल्ला कर निकल लेता है! क्योंकि उसका कम है ओरत के विचारो को दबाना ! पर एक लड़किया अपनी सारी भडास अपने अन्तःकरण में समा लेती है , और अग्नि की तरह जलती रहती है ! हो सकता है सारे लोग इस विचार से इतफाक रखते है ! पर यदि यह मत गलत होता तो अज के परिवेश में महिला आत्महत्या दर बड़ता नहीं ! आंकड़ों का सत्ये कहता है महिला आत्महत्या दर पुरषों की अपेक्षा १० गुना अधिक है !
यदि आंकड़ों पर द्रष्टि डालें तो देखेंगे की बहार काम करने वाली लडकियां जो आत्म निर्भर हैं तथा समाज में उनका अपना मुकाम है तथा वो अपने जीवन के सारे फैसले स्वयं ले सकती हैं! इसके बावजूद भी उन महिलाओं की आत्महत्या दर अधिक है चाहे वो आम लड़की हो या सेलेब्रिटी जब उन्हें प्यार में धोखा मिलता है तो वो धोखे का आघात बर्दाश्त नही कर पाती है ! तब अपने जीवन ko समाप्त करना ही एक आसान रास्ता मानती है !
अभी हाल ही में प्रसिद्ध मॉडल विवेक बाबा ने आत्महत्या करली ,कारण अपनी प्रेमी का धोखा और तिरस्कार बर्दाश्त नही कर सकी तो उन्होंने आत्महत्या कर ली वाही मिसइण्डिया रही नफीसा जोसेफ ने भी अपने प्रेमी से धोखा खाकर कुछ समय पूर्व आत्महत्या कर ली थी, ऐसे ही यदि आंकड़ों पे दृष्टि डालें तो देखेंगे की रोजाना कोई कोई लड़की प्रेम में आघात पाकर अपनी जीवन लीला समाप्त करती जा रही है !
मनोविज्ञानिको का मत्त है "आज के परिवेश में जहाँ लोगों को अपने जी\वन निर्वहन के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ रहा है घर और बहार अत्यंत मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है वही प्यार में धोखा खाना उनके लिए असहनीय होता है और उनके लिए जीवन समाप्त करना एक आसान उपाय लोगों को दीखता है "
चाहे कोई औरत पूरी तरह स्वतंत्र या आत्मनिर्भर क्यों हो प्यार का धोखा उसके लिए असहनीय होता है क्योकि स्त्रियों में संवेदनशीलता एवेम भावुकता अधिक होती है पुरुषमानसिकता स्त्रियों की मानसिकता से बिलकुल विपरीत होती है! पुरुष का आकर्षण स्त्रियों से शारीरिक रूप से होता है ! उसका प्रेम शरीर से शुरू होकर उसी पे समाप्त हो जाता है और वो आसानी से एक को छोड़ कर दूसरे से जुड़ जाता है! उसके लिए प्रेम प्यार की बातें आम होती है`! परन्तु एक लड़की किसी भी पुरुष से आत्मा तथा मन से जुडती है और जब उसे आत्मिक आघात होता है , तो वो अघात उसके लिए असहनीय होता है और तब उसके सामने सबसे आसान विकल्प बचता है अपनी जीवन लीला को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त कर दें ! स्त्री मानसिकता मतलब समय से पहले अपने आप को उम्रसे बड़ा मनलेना ! इसका बड़ा कारण ईश्वरी की भी बेइंसाफी है ! एक पुरुष 60 वर्ष की आयु में भी पिता बन सकता है पर एक स्त्री का ३५ से ३७ वर्ष की आयु के बाद उसका माँ बनना कठिन होता है और आज जहाँ लोग अपना करियर बनाने के लिए ३० का आंकड़ा पार कर जाते हैं तो उस उम्र में प्यार में धोखा खाना उनके लिए असहनिये हो जाता है और उनका सारा आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है! तब या तो अपनी पूरी उर्जा को इन्साफ की गुहार के लिए लगा देते हैं तब उनपर दूसरा आघात उनके चरित्र पर होता है जो उनकी आत्मा पर असहनीय प्रहार होता है! क्या किसी ने सोचा है कभी की महिला हो या लड़की उनमे संवीदनशीलता होती है क्या वो ऐसे ही मरती जाएँगी उन्हें भी जीने का हक्क है ! इन नपुंसक का-पुरुषों को किसने हक्क दिया है रोज़ रोज़ लड़कियों एवम महिलाओं को ऐसे ही मारते जा रहे हैं!

उन्हें किसने हक़ दिया है कि झूठे प्रेम जाल में फंसओ और जब सच सामने अत hai तो वो इंसान भाग खड़ा हुआ और जब उसका सच समाज के लोगों और उसके पिता और पत्नी को बतया जये तो वो नारी चरित्र पर प्रहार करता है जान से मारने की भी धमकी देता है ! अब लड़की के पास दो रास्ते होते हैं या तो अपने सम्मान के लिए लड़ाई लड़े और अपने चरित्र पर प्रहार करने वाले को सबके सामने लाये
पर मै जानती हूँ की कोई भी लड़की किसी भी परुष का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती और वो जिस भी पुरुष से अपने इन्साफ की गुहार करेगी वो उसे इन्साफ नहीं दिला सकता क्यूंकि वो भी स्वयं पुरुष है तब लड़की मजबूर हो जाती है क्यूंकि उसका एक कदम उसके माता पिता के नाम पर सवालिया निशाँ लगा देता है उसके लिए तीसरा रास्ता बचता है अपने आपको अनंत अँधेरे में झोंक दे जिसमे वो तिल तिल मरती है पर उसको मरता हुआ कोई नही देख पाता
आज मेरा प्रश्न आज ईश्वर और समाज से है ऐसे नपुंसक पुरुष कब तक नारी जीवन स्वेदना से खेलते रहेंगे और हमे कब तक आत्महत्या की काली गर्द में फेंकते रहेंगे

आज मै सुबह लखनऊ से बाराबंकी जा रही थी दून एक्सप्रेस से ,गाड़ी में बहुत भीड़ थी मै अपने मित्र के साथ स्लीपर डिब्बे में चढ़ गई .खाली जगह देख कर हम बैठ गए ! गाड़ी अभी कुछ ही दूर चली हो गी की कर्कस आवाज में पर कानो को अच्छा लगने वाला गीत कानो से टकराया ,गाने के बोल थे ''रातो को उठ उठ कर जिनके लिए रोते है ...वो अपने मकानों में आराम से सोते है....'' उत्सुकता बस मैंने आवाज की दिशा में देखा ,सामने एक ८-९ साल की बच्ची हाथ में दो पथ्थरो का टुकड़ा लिए उसे बजाकर गाना गा रही थी और पैसे मांग रही थी ..मै ने अपने मित्र की तरफ देखा उन्हों ने मेरे हाथ में ५ का सिक्का रख दिया मैंने उस बच्ची को वो पैसे दे दिए ,वो आगे बढ गयी तो मेरे मित्र ने अख़बार मुझे पकड़ा दिया और एक खबर की तरफ इशारा किया .मैंने देखा ,की अख़बार में लडकियों के सिच्छा एवं विकास पर सरकार की कोशिश के बिसय में बड़ा सा लेख छपा था .मुझे पता नहीं केव वो लेख पड़ने का मन नहीं किया ,वो एक जोक सा लगरहा था ,मैंने सवाल के अंदाज में पूछा की क्या ये लड़की नहीं है एस जैसे बच्चियों का क्या भविष्य है ?
मेरे मित्र ने शालीनता से कहा की ये बच्ची या इन जैसे तमाम बच्चिया अपने उम्र से पहले बड़ी हो जायेगी ..आज हो सकता है की जो गाना ये गा रही है उसका मतलब उसे नहीं मालूम हो लेकिन जल्द ही ये जान जाये गी की इसकी सबसे बड़ी संपत्ति इसकी सरीर है जिसे लोग खा जाने के अंदाज में देखते है इसकी नजर में समाज एक जंगल की तरह हो जाये गा जहा पुरुष रूपी जानवर हमेसा मौके की तलास में रहते है मौका मिला तो कुछ भी करने से बाज नहीं आये गे..इनके लिए आजादी ,लोकतंत्र ,जीने का अधिकार, सरकार,कुछ भी मायने नहीं रखता ...इनके हिस्से जी आर पी की गालिया ही सरकारी आदेश है क़ानूनी फरमान है!
मेरे मुख से बरबस निकला ....इसका जिम्मेदार कौन है ?......गरीब के माँ बाप ,...कानून ....या ये समाज !
हमने कैसा समाज बना डाला है ??...........इसे बदलना हो गा !.......बदलने की कोसिस करनी हो गी ?
बाराबंकी स्टेशन आ चुका था हम ट्रेन से उतर गए पर ये सवाल मरे दिमाग में चड़ा रहा !...........कि क्या ये सरकार ,ये देश इनका नहीं है.?

Friday, March 16, 2012

view

१. 

जब किसी रिश्ते को सामाजिक रूप से सुविकर करने में असुविधा हो 
तो उसे तोड़ देना ही न्याय संगत होता है
वरना वो रिश्ते बोझ बन जाते है


२. 

प्रेम ईस्वर की सबसे बही धरोहर है
 इसके कम वासना पर खर्च करना मुर्खतपूर्ण  है ,
क्योकि  यदि यह  खजाना खतम होगया तो 
आप के जीवन  से मंजू रोशनी खतम होते देर नहीं लगेगी 


चाहती हूँ अधखुले केसों को
फिर से लहरने दू
मौन हो जाऊ खुदसे
भूल जाऊ सब बसंत
फिर से नए सुबह तलास लू
उम्मीद के हर शिखर पर बांध दू जीवन  का  पहर
भूल जाऊ  दुनिया के रंजो गम 
आने दू अपनी आँखों  में खुले असमानों का घेरा 




Wednesday, March 14, 2012

sachi kahani


लेखिका मनु मंजू शुक्‍ला अवध रिगल टाइम्‍स की संपादक और समाज सेविका हैं.












शाम का वक़्त था मान्या अपने रूम में अकेली बैठी किताबो के पन्ने पलट रही थी मानों पढने का ढोंग कर रही थी तभी टेलेफोन की घंटी उसके ध्यान को भंग कर देती है और वो फ़िर से चेतना में आ जाती हैहडबड़ा  कर  फ़ोन उठा कर कहती  है हेलो!  
फ़ोन से उधर  से आवाज आती है, मै आंचल बोल रही हूँ  
मान्या कहती है "हाँ  आंचल!  बताओ  कैसी हो  क्या  चल   रहा है " 
और तभी  आंचल फूट  फूट कर रोने लगती  है और कहती है क़ि "मै ठीक नही हूँ " और इतना कहकर फूट - फूट कर रोने लगती है मान्या को  समझ  में  नही आता उससे क्या कहे उसका  हौसला बढाती  है और पूछने का प्रयास करती है और पूछती है क्या हुआ तुम क्यों रो रही हो
आंचल मान्या से कहती है क़ि मै बहुत परेशान  हूँमै थक गयी हूँ अकेलेपन से बोलती बोलते उसकी आवाज बहुत गंभीर  हो गयी थी मान्या ने आंचल से पूछा ऐसा क्या हुआ मुझे बताओ अपना समझकर
  आँचल - यार मै तुम्हें क्या बताओ  बहुत कुछ  बताने को है पर कहाँ  से शुरू करू 
मान्या- हमममम 
आगे आंचल कहती है एक साल पहले विशाल मेरी जिंदगी में आता है मैंने  ये बात सबको बताई थी पर  तुम्हें नही बताई थी हम दोनों मेट्रोमोलियन  के द्वारा नेट पर मिले  और  बहुत सारी बाते कीविशाल ने अपने बारे मे अपने परिवार के बारे मे तथा अपने कार्य के बारे में सब कुछ बताया उसके सच और ईमानदारी  ने मेरा दिल जीत लिया था मेरी भी बातें उसे अच्छी  लगती थी हम दोनों घंटों फोन पर बातें किया करते थे मैंने दिन में क्या किया उसने दिन में क्या किया सब कुछ और मुझे लगा विशाल  मुझसे बहुत प्यार करता है ये सोचकर मै भी विशाल से प्यार करने लगी
मान्या-हम्म्म्म
आँचल बातों का सिलसिला आगे बढाती है कहती है विशाल ने मुझसे मिलने का आग्रह किया पर मैं उसके शहर नहीं जा सकती थी क्योंकि उसका शहर बैंगलोर  मेरे लिये अनजाना था हम दोनों ने मुंबई में मिलना तय किया क्योंकि मुंबई में मेरे कज़िन का परिवार रहता था अपने माँ बाप की मर्ज़ी के खिलाफ मै मुंबई के लिये रवाना हुई
मान्या-हुम्म्म्मम्म्म्म
आँचल - मै विशाल से मिलने के लिये आतुर थी मुंबई पहुंचकर विशाल को फोन किया और दोपहर के समय एक रेसटोरेंट   में मिलना तय हुआ मै विशाल से मिली जैसा वो बातो में दिखता था वो उसके  विपरीत था एक आधुनिक ज़माने का इंसान था   मै सीधी सादी सिम्पल लड़की  थी हम मिले बहुत सारी बातें की पूरा दिन एक साथ बिताया दूसरे दिन सुबह फ़िर से मिलना तय हुआ विशाल ने मुझे दीदी के घर छोड़ा दूसरे दिन  सुबह मै विशाल से मिलने के लिये घर से निकल पड़ी पूरे दिन बाद शाम को विशाल  से पूछा - तुमने क्या   तय किया ? विशाल ने उत्तर दिया कि देखो आँचल, मै सच बोलूँगा तुम मेरे साथ कहीं भी फिट नहीं बैठती ना ही मेरे स्टेटस से, ना ही मेरी सोच के हिसाब से 
मान्या- ऐसा उसने क्यों कहा?
आँचल- शायद विशाल को आधी नंगी लडकियां पसंद हैं जो उसके साथ होटल में जाएँ उसकी सारी नीड्स पूरी करें उसके विचारो से मुझे लगा कि  उसे एक पत्नी नहीं एक गर्लफ्रेंड चाहिए थी इतना कहते कहते आँचल का गला भर आया था वो कहती है की जब विशाल ने मुझसे ऐसा कहा तो मै उसी पल वहां से उठी और बाथरूम  में जाकर मै  चीख  चीख  कर  खूब  रोई  और  खुद  को  कोसने  लगी  कि  मैंने   ऐसे  आदमी  पर  विश्वास  क्यों  किया ? क्यों  ऐसे  आदमी  से  प्यार  किया ? रात उसी तरह रोते रोते कट जाती है सुबह मै अपना बैग उठाकर वापस अपने घर चली जाती हूँ कुछ दिन तक विशाल का ना कोई फोन आता है और ना ही मेरे मेसेज  का जवाब आता है एक दिन अचानक विशाल का फोन आता है तो मै पूछती हूँ कि आज अचानक तुमने मुझे फोन कैसे किया ?
विशाल- क्या करूं ?  तुम्हारी बक बक कि आदत जो पड़ चुकी है आँचल बिजी  होने का नाटक करके विशाल के फोन को इग्नोर कर देती है यूं ही बातों का सिलसिला कुछ दिन तक चलता है और कुछ दिन के बाद थम जाता है आँचल बताती है कि दिल के हाथों मजबूर होकर मै कभी कभी विशाल को मेसेज भेज दिया करती थी एक दिन जब मैंने मेसेज भेजा तो विशाल फोन करके कहता है कि मेरी मंगेतर तुमसे बात करना चाहती है 
आँचल बात करने से मना कर देती है लेकिन विशाल के बार बार आग्रह करने पर बात करने के लिये हाँ कर देती है 
आँचल मान्या से बताती है कि फोन पर उधर से एक लड़की की आवाज़ आती है मै विशाल की मंगेतर बोल रही हूँ मैंने सोचा कि शायद विशाल जैसे अधेड़ उम्र के इंसान को छोटी उम्र की लडकियां पसंद हैं इसलिए मैंने उससे पूछा कि किस स्कूल में पढती हो ?  वो हंसी और बोली कि मै जॉब करती हूँ तो मैंने उससे कहा कि मैंने ये प्रश्न इसलिए  पूछा कि शायद विशाल को बच्चियां पसंद हैं मैंने उससे पूछा कि तुम लोग शादी कब कर रहे हो? इस पर उसने कहा कि अभी तो मै इन्हें दो महीने से जानती हूँ पहले इन्हें जान लूं फ़िर शादी करेंगे पर जब मै विशाल के साथ होती हूँ तब तुम्हारे मेसेज बहुत डिस्टर्ब करते हैं तो मैंने उस लड़की से कहा कि विशाल की  बहुत सारी गर्लफ्रेंड्स  हैं वो भी तो मेसेज करती होंगी क्या विशाल ने तुम्हें नहीं बताया? इस पर वो लड़की  हडबड़ा गयी और उधर से विशाल के इन्सट्रकशंस देने की आवाज़ आई शायद वो फोन कट करने की बात कर रहा था लड़की कहती  है कि अच्छा मै फोन रखती हूँ तुमसे बात करके बहुत अच्छा लगा 
आँचल- तब मैंने उस लड़की को जवाब दिया पर मुझे तुमसे बात करके कोई ख़ुशी नहीं हुई इतना कहकर मैंने फोन रख दिया सच पूछो तो मुझे उस दिन बहुत दुःख हुआ  और मै घंटों रोती रही  मेरे एक  मित्र ने मुझे  बहुत ढ़ाढस बंधाया और कहा कि मै हमेशा तुम्हारे साथ हूँ और हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा हमारा रिश्ता एक पवित्र रिश्ता है पर उस मित्र कि पत्नी नहीं चाहती थी कि वो मुझसे बात करे जबकि मैंने ही उन दोनों की शादी कराई थी सच पूछो तो आज मै बिलकुल अकेली हूँ इतना कहकर आँचल फूट फूट कर रोने लगती है
मान्या आँचल से कहती है कि रो मत मै तुम्हारे साथ हूँ हमेशा हमेशामेरे होते हुए तुम अपने आप को अकेला कैसे समझ सकती हो और आँचल को बहुत सारी दिलासा देती है पर मान्या भी शायद इस सच को अच्छे से जानती है कि इस दुनिया में प्यार का कोई मोल नहीं हैआँचल कहती है कि मान्या ! घर पर कोई आ गया है मुझे फोन रखना पड़ेगा मै फ़िर तुमसे बात करुँगी मै जानती हूँ कि तुम मुझे समझती हो आगे से मै तुम्हारी हर बात मानूंगी और तुम्हें सारी बात बताऊंगी मान्या! कभी कभी फोन कर लिया करो मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत हैफोन रखने के बाद मान्या अपने अतीत के पन्नों में खो जाती है उससे भी तो भावेश ने ऐसा ही किया था अनगिनत उससे झूठ बोले थे और जब अंत में आखिरी बार बात हुई तो उसने कहा था कि मान्या! मै तुमसे प्यार नहीं करता था मुझे तुम्हारे शरीर की  ज़रूरत थी जो तुमने पूरी नहीं कि इसलिए मै वहां चला  गया जहां मेरी इच्छा पूरी हो गयी अगर तुम चाहो तो मेरी मित्र  बन सकती हो हम आजीवन अच्छे मित्र बन सकते हैं और उस समय भी भावेश का  देह लालच ही मान्या के पास लाया था ना कि प्रेम उस समय मान्या ने  उससे कहा था कि इंसान दोस्ती  से प्रेम की तरफ बढ़ सकता है पर प्रेम से दोस्ती की तरफ वापस आना असम्भव है और जब मान्या ने उसे अंतिम फोन किया था तो उसने भी वही किया था जो   विशाल ने आँचल के साथ किया था और कहा था कि तुम्हारे फोन मुझे डिस्टर्ब करते हैं वो अंतिम फोन था जिसके बाद मान्या ने भावेश को कभी फोन नहीं किया लेकिन उसके दिमाग में हमेशा ये प्रश्न कौंधता है कि कैसे पुरुष ? कैसा इनका प्रेम मायाजाल ? क्या इन्हें दूसरों कि भावनाओं कि कोई क़द्र नहीं?क्या इन्हें कभी सज़ा मिलेगी? पर उत्तर मिलता है कि शायद नहीं क्योंकि भगवान् भी पुरुष है और वो  पत्थर का है वो भी स्वार्थी है तो वो कैसे इन्हें दंड दे सकता है?

Sunday, March 11, 2012

आज मै बहूत दुखी हूँ क्यों की मेरा एक बच्चा अब स्कूल नहीं जा सके गा



 

मेरी रिगल  क्लास में एक बच्चा   जिसकी उम्र ११ साल है कई  दिन से नहीं आरहा था 
उसे देखकर मेने  पूछा पढने  क्यों नहीं आरहे हो 
उने जवाब दिया " maam मै नोकरी करेने जाता हूँ मुझे समय नहीं मिलता इस लिये नहीं आ रहा हूँ 
मैनेउससे पूछा " तुम्हे कितना मिलता है "
उसने बतया " २० रूपया " और  "१५ रूपया खाने के लिया "
मैने उससे पूछा  " जब तुम नहीं  जाते हो तब "
उसने बतया  "तब नहीं मिलता "

उसके इस बात को सुनकर मे बस अवाक् रहा गई 
सच तो है आज उसकी और उसके परिवार कि जरुरत भोजन है ! यदि पेट  भरेगा तब ही तो पढाई होगी 
उसके परिवार में वो चार भाई १ बहन  है पिता बीमार माँ घरो में बर्तन मजतीवो घर का सबसे बड़ा बेटे है इस लिया कम करना उसकी मज़बूरी है 

दूसरी तरफ वो लोग जिनके पास मुद्रा है  अपने शोक पर  तो खर्च करसकते है पर इन बच्चो  पर खर्च करने के लिया उनके पास कुछ भी नहीं ! 

जीवन का कटु सच है हम इन बच्चो को अपना नोकर तो बनालेते है जनवरो कि तरह कम भी लेते है पर कभी भी क्या हमें एक पल के लिया सोचा  सबको मानवता पड़ने वाला हमारा जमीरनहीं सोचता है"  ये इन्सान है ", इन्हें भी पढने और जीने का हक़ है 

सभ्य समाज में बाल श्रमिकों का निरंतर शोषण किया जाना निसंदेह चिंता का विषय है . देश में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वालो के बच्चो को मजबूरीवश पेट की खातिर काम करना पड़ता है . देश में कई कानून बनाए तो गए है पर नौकरशाही या नेताओं द्वारा उन कानूनों को असलीजामा नहीं पहिनाया गया है . १४ वर्ष की कम आयु के बच्चो से काम लेना अपराध माना गया है पर देखने में आया कि बढ़ती महगाई के कारण निरंतर बाल श्रमिकों की संख्या बढ़ रही है . राजनेता भी बाल श्रमिकों के हाथो से चाय पीते लेते जा सकते है पर मैंने किसी राजनेता को उन्ही बाल श्रमिकों के अधिकारों कि रक्षा करने के लिए आवाज बुलंद करते नहीं देखा है यह सच है
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में चौदह वर्ष तक की आयु के सीमांत बाल श्रमिकों की संख्या 1991 में 2203208 थी, जो 2001 में 207.10 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 6987386 हो गई। विनिर्माण और मरम्मत ऐसे क्षेत्र हैं जहां 2006 के बालश्रम के प्रतिबंध के बावजूद लाखों बच्चों को रोजगार में लगाया गया है। 2001 की जनगणना के अनुसार होटलों, चाय की दुकानों और थड़ियों, रेस्तरांओं और ढाबों, परचून की दुकानों आदि में 61 हजार से अधिक बच्चे काम कर रहे हैं।
जिन बच्चों पर देश के भविष्य की नींव टिकी हुई है, उनकी नींव खुद ही कमजोर हो तो वे भला राष्ट्र का बोझ क्या उठायेंगे। 

आज प्रश् यह उठता है कि क्या कोई कानून बालश्रम को रोक सकता है ?
क्या कोई कानून बच्चो कि और उनके परिवार  कि भूख कि  आग को ठंडा कर सकता है 

ये दौलत भी ले लो
ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वे कागज की कच्च्ती वो बारिश का पानी।

Wednesday, March 7, 2012

ओ मोरे बाके बिहारी


सबका जीवन होली  के रंगों से भर जाए यही दू है ईस्वर  से 
आप को होली की हार्दिक शुभकामना 


ना भीगी नीर तन
नैनन भीगी आज ...................
यह विरहन की प्रीत जगी
लागी मन में आग .....................
भई बावरी मंजुमन ले
मे बिरहन आज
प्रीत की रित जगी
ऐसो मन मोहन
सुध बुध भूली आज ...................
कृष्णा -कृष्णा भई दिवानी
मीरा सी मैं आज.............
ऐसी प्रीत सजी तन मोरे
जग का करिहे उपहास .....................
ओ मनमोहन 
काहे रूठे 
लो अब सुध  हमार
कोरी चुनर कोरी  
ऐसो रंगों मोहे मोहन 
फिर न चड़े कोई गुलाल 

Sunday, March 4, 2012

वो बस मान्‍या का शरीर चाहता था! वो बस मान्‍या का शरीर चाहता था!


मैने ने जब यहाँ कहानी लिखी थी तब नहीं सोचा था की इस कहानी का हशर क्या होगे? क्या समाज इस लड़की को सम्मान देगा ? क्या समाज नारी भावना को समझेगा ? 
नहीं कभी  नहीं ....  
महिला किसी पुरुष पर उगली उठाई यहाँ समाज   कैसे बर्दाश करसकता है  ! आज मुझे लगता है की मान्य को उगली उठाने से पहले मर जाना चाहिए था 


इस कहानी में  भावेश  दर असल ****** *****है ......एक कमीना पत्रकार  

इसमें गलती लड़की की ही है जिसने दिमाग से नहीं हीं दिल से काम लिया 
उसे चाहिए था की वो बिहार की सीलू   तरह काम करती तो शयद पूरे समाज की नजरे खुलती 




 इंटरनेट के जाल में फंसी लड़की की कहानी : झूठे प्रेम का सब्‍जबाग दिखाकर उसकी भावनाओं से खेलना चाहता था भावेश : सुबह का समय था, मान्या अपने ऑफिस में बैठी अपने कंप्यूटर में कुछ मेल पढ़ रही थी और उनके उत्तर दे रही थी कि अचानक उसने एक फ्रेंड रिक्‍वेस्‍ट देखा, उसने सोचा यह कौन है, चलो उसका प्रोफाइल देखते है? मन में आए विचार के अनुसार वह उस प्रोफाइल पर गई और उसे पढ़ने लगी...नाम-भावेश, पता बनारस और विचारों से एक कन्‍फ्यूजिंग इन्सान...पर शब्दों में आदर्श महिलाओं के प्रति उच्च विचारधारा! उसके प्रोफाइल को पढ़कर मान्या को लगता है, चलो एक अच्छा व्‍यक्ति लग रहा है, उसने भावेश के दोस्ती के निमंत्रण को सह्दय स्वीकार कर लिया और अपने कार्यो में लग गई. दूसरे दिन सुबह जब मान्या ने अपना कंप्यूटर खोला तो भावेश को ऑनलाइन पाया और भावेश ने मान्या को सुबह का नमस्ते भी भेजा। मान्या ने भी उन्हें सादगी से जवाब दिया और अपने रोजमर्रा के कामों में लग गई. ऐसा कई दिनों तक चलता रहा.
एक दिन सुबह मान्या अपनी एक मित्र से बात कर रही थी, तभी भावेश ने उसे सुबह का नमस्ते किया, उसने उन्हें जवाब दिया और भावेश के पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर देने लगी. भावेश मान्या से कहता है- खुद की तलाश हमेशा कठिन होती है और जो एक बार खुद को खो देता है, उसे ढूंढना मुश्किल हो जाता है. इसके बाद भावेश ने लिखा- हम भावेश हैं, आपका नाम क्या है? मान्या सिंह. मान्या- कहां से? भावेश- बनारस से हूँ, यहाँ की सुबह बेहद सुन्दर होती है, रेत के बंजरों पर बादलों की गड़गड़ाहट हमेशा अच्छी लगती है. मान्या -यह हमने सुना है, गंगा का किनारा और संतो की बाणी और शंखो की धुन. भावेश -आप कहां से? मान्या- हम लखनऊ से हैं, "सिटी ऑफ़ नवाब्‍स." भावेश- जानकर अच्छा लगा, मैं भी कभी-कभी वहां आता हूँ और मुझे लखनऊ वैसे भी कभी अजनबी जैसा नहीं लगा. मान्या- यह जानकर ख़ुशी हुई कि आप को हमारा शहर अच्छा लगता है.भावेश- कुछ अलग सा है. आप क्या करती हैं? मान्या- कुछ नहीं एक जॉब की तलाश कर रही हूँ! अच्छा अब हम चलते हैं, आप से फिर बात होगी! खुश रहिए और अपना ख्याल रखियेगा. लेकिन भावेश मान्या को बड़ा अजीब उत्तर देता है. भावेश- मुझे तो ख़ुशी होनी ही थी, दोस्ती का हाँथ जो पहले हमने बढ़ाया था.
अगले दिन सुबह के समय मान्या ऑनलाइन होती है और भावेश को अच्छी सुबह की बधाई देती है. पर भावेश उससे कहता है कि मेरे सपने पूरे नहीं होते, जब कोई कहता है-जा तेरे सपने पूरे हों, तो हंसी आती है. मान्या कहती है- मेरे सपने पूरे हो या न हों पर मैं कोशिश जरुर करती हूं और आप इतनी निराशावादी बातें क्यों करते है? भावेश- नहीं, निराशावादी मैं तो हूँ ही नहीं! बात सपनों के सच होने की और न होने की है. शायद इसलिये सपने नहीं देखता. कल आप बात करते-करते अचानक चली गईं तो मैंने आपकी प्रोफाइल पढ़ी, कुछ अलग हटकर था. मान्या ने उत्तर दिया हम ऐसे ही हैं, और इस तरह उनकी बातों का सिलसिला चलने लगा, पर भावेश के दिल में क्या चल रहा था, वो इस सच से अनजान थी! चार-पांच दिन के बाद भावेश ने मान्या से उसका फ़ोन नंबर मांगा. पहले तो मान्या मना कर देती है! पर बाद में भावेश की बातों पर विश्‍वास कर के अपना नंबर उसे दे देती है! उसी दिन भावेश ने मान्या से कहा कि वो उससे बहुत प्यार करता है, पर मान्या ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया.
उसी वक्त भावेश उससे कहता है-मान्या तुम्हें हमसे प्यार करना ही होगा. यह बात मान्या को बड़ी अजीब सी लगती है. मान्या को लगा कि देखो यह अपनी बात के पीछे लग गए हैं, हम इन्हें अच्छी तरह से जानते भी नहीं हैं और यह हमसे कहते हैं-हमसे प्यार करते है! क्या ऐसे भी कोई किसी को प्यार करता है, पर भावेश का पागलपन बढ़ता ही जा रहा था. मान्या को उनसे डर सा लगने लगा! तब मान्या भावेश से कहती है कि अगर वो उसे प्यार करते हैं तो उससे विवाह कर लें. पर भावेश विवाह करने से मना कर देता है और अपने परिवार की बहुत सी समस्या बताता है... उसकी बहन का विवाह आजीवन नहीं हो सकता तो वो कैसे विवाह कर सकता है और उसकी एक भाभी हैं, जिसकी और उनके बच्चो की उसे ही देखभाल करनी है, क्योंकि उसके भाई की मृत्यु सड़क दुर्घटना में हो गयी है और उनकी माँ चाहती है कि वो अपनी विधवा भाभी से शादी कर ले.
मान्या कहती है कि अगर ऐसा है तो उसे अपनी भाभी से प्यार का प्रस्ताव रखना चाहिए न की उससे. इसपर भावेश कहता है- वो मान्या से प्यार करता है, किसी और से शादी नहीं कर सकता. मान्या भावेश के इस शब्दजाल में फंस जाती है! मान्या को लगता है- शायद  भावेश सच बोल रहा है. वो उसके प्रेम-प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है. मान्या कहती है- भावेश मुझसे विवाह कर लो तो  हम-दोनों एक साथ हर समस्या का सामना कर लेंगे. भावेश नहीं मानता है और कहता है- वो आजीवन बिना विवाह के ही रहेगा. पता नहीं क्यों मान्या उसकी बातों पर भरोसा कर लेती है और भावेश से कहती है कि वो दोस्त की तरह से आजीवन रह सकते हैं, पर भावेश नहीं मानता है. एक दिन भावेश मान्या के शहर उससे मिलने आता है. उस दिन मान्या बहुत खुश होती है, क्योंकि जीवन में पहली बार किसी अपने से मिलने जा रही होती है, पर जब वो भावेश से मिलती है तो उसकी आत्मा कहती है कि कहीं कुछ गलत है. वो भावेश को सब से मिलाती है पर भावेश उसे किसी से पहचान कराने से भी डरता है और बस वह उससे कुछ ऐसी डिमांड करता है जो कोई भी लड़की पूरे नहीं कर सकती हो. मान्या उसकी इच्छा पूरा करने से मना कर देती है. वह भावेश को बहुत समझाती है कि वो एक अच्छा दोस्त बन सकती है, पर भावेश का बर्ताव बड़ी अजीब सा हो जाता है, क्‍योंकि भावेश का मकसद सिर्फ मान्या के शारीर को पाना था!
बड़ा अजीब सा लग रहा था मान्या को, क्या यह वही इंसान है, जो उससे रो-रो कर कहता था कि वो उससे प्यार करता है और उसक बिना जी नहीं सकता ? यह वो नहीं कोई अजनबी सा इन्सान लग रहा है! पर वो तो इस इंसान से प्यार करने लगी थी. उसने तो इस इंसान के साथ अपना पूरा जीवन बिताने के सपने देखे थे. उसके पास भावेश पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था, क्योंकि वो इस इंसान से दिल से जुड़ गयी थी. भावेश चला जाता है और मान्या उसे चाह कर भी नहीं रोक पाती. धीरे-धीरे समय का चक्र आगे बढता है. मान्या का विश्वास भावेश से हटने लगता है. भावेश की रोज नयी महिला मित्रों की संख्या बढने लगती है तो वो मान्या को भूलने लगता है. वो उससे बात नहीं करता. उसके फोन का भी जवाब नहीं देता. मान्या दिन पर दिन मरती जा रही थी और वो अपने लिए कुछ नहीं कर पा रही थी. आज उसे वो बातें बेमानी लगती हैं- प्यार उससे करो, जो प्‍यार तुमसे करे. इसी बात पर विश्वास करके ही तो उसने भावेश से प्यार किया था!
एक दिन मान्या भावेश को फोन करती है और बहुत सारी बातें करती है. इसी बीच भावेश उस औरत का नाम लेता है, जिसे वो अपनी भाभी बताता था! तब मान्या भावेश से पूछती है कि तुम्हें  आज सच बताना होगा क्या रिश्ता है तुम्हारा इस औरत से? तब भावेश कहता है- उसने उस औरत से शादी कर ली है, क्योकि शादी करना उसकी मजबूरी थी. वो मान्या से मिलता है और बहुत सारी झूठी कहानियां सुनाता है, पर मान्या को उसकी किसी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. कहा जाता है सच अपने आप बोलता है. किस्मत ने भी सच जानने में मान्या का साथ दिया. इस मुलाकात के कुछ दिन बाद ही भावेश के सहकर्मी से बात होती है, जिसकी पहचान भावेश ने मान्‍या से करा दी थी. वो मान्या को बताता है कि भावेश की शादी तो दस-ग्‍यारह साल पूर्व ही हो चुकी है  और उसके दो बच्चे भी हैं, आज उसकी शादी की सालगिरह है. यह सुनकर मान्या के पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाती है, उसकी आंखों के सामने अंधेरा सा छा जाता हैं. उसे कुछ भी सुनाई नहीं देता और कुछ भी नहीं दिखाई देता, मानो किसी ने उसके सारे सपने एक ही झटके में तोड़ दिए हो! जो इंसान उसके सामने महान बनने का ढोंग कर रहा था, आज उसका गंदा और बदनुमा चेहरा उसके सामने आ गया था.
वह भावेश से चीख-चीख कर पूछती है- अगर वो शादी-शुदा था तो उसने उससे प्यार का झूठा नाटक क्यों किया? उसके जज्बातों से क्यों खेला? भावेश के पास मान्या के एक भी प्रश्न का उतर नहीं था, और ना ही सच का सामना करने की हिम्मत, क्योंकि उस इन्सान का झूठ सामने आ चुका था. एक और लड़की के विश्‍वास के साथ एक कमीना इन्सान खेल चुका था. वो लाचार थी क्योंकि वो एक ऊंचे कद का इन्सान था! कुछ दिन बाद पता चलता है कि यह इन्सान न जाने कितने महिलाओं और लड़कियों के जीवन से खेल चुका है और अभी भी खेल रहा है! तब उसने अपने नाम और चरित्र की परवाह किये बिना भावेश का सच दुनिया के सामने लाने का प्रयास भी किया! पर उसका यह प्रयास निरर्थक रहा क्योंकि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था. उस इन्सान के पिता और पत्नी को जब मान्‍या ने यह बात बताई तो भावेश की पत्नी ने मान्या के चरित्र पर ही सवालिया निशान लगा दिया! भावेश ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी अपना गुनाह छुपाने के लिए. उसने मान्या को तो जान से मारने की धमकी तक दे डाली!
मान्या ने हर किसी से सहायता  मांगी, पर उसकी लाचारगी ने उसे हर जगह से खाली ही लौटाया. मान्या पूरी तरह से टूट चुकी थी, उसके जीवन के सारे रास्ते खत्म हो चुके थे, पर उसने हर नहीं मानी और उसने इसका न्याय भगवान पर छोड़ दिया.  इस सच्‍ची घटना को मैंने भी कहानी की शक्ल दे दी. अब देखते हैं अंत क्या होता है इस सच्‍ची कहानी का! पर मैं जानती हूँ कि आज के परिवेश में हार सिर्फ और सिर्फ नारी की ही होती है! कोई कितना भी सच क्यों न बोले पर उसका सच पुरुष के सामने बौना हो जाता है! कितनी बड़ी विडंबना है कि सच को अपनी बात साबित करने के लिया मरना पड़ता है और जब सब खतम हो जाता है तो लोग चंद आंसू बहाने के लिए चले आते हैं!
इस घटना को मैंने अपनी आंखों के सामने घटते देखा है. मेरी लाचारगी और बेबसी ये है कि मैं भी इस मामले में अब कुछ भी नहीं कर सकती! तब लगा कि इसे समाज के सामने रखना चाहिए. समाज ही इस सच पर निर्णय करे. पर जानती हूँ, यहाँ भी हार नारी की ही होगी! क्योंकि नारी ही नारी की दुश्मन होती है! यदि एक नारी दूसरी नारी के साथ हो तो कोई उसे वेश्या या रखैल कहने का साहस नहीं कर सकता! ना ही कोई उसे डायन  कहकर उसके जीभ काट सकता है,  ना ही वस्‍त्रविहीन करके उसे पूरे गाव में घुमा सकता है! पर मुझे पता है, यह सब होता रहा है औरा यह आगे भी होता रहेगा, क्‍योंकि कोई भी युग तभी बदलेगा जब इंसानों के अंदर इंसानियत जागेगी. और हर भावेश को अपनी गलती पर शर्मिंदगी होगी और पश्‍चाताप होगा! जब कोई औरत किसी की बेचारगी पर ताने नहीं मारेगी. ये कविता नारी के पीड़ा को व्‍यक्‍त करती है और जब तक इसे बदला नहीं जायेगा तब तक मान्‍या जैसी लड़कियों को दुख झेलते रहना पड़ेगा.
है यह नारी हृदय पीड़ा से भरा,
यह नर क्या जाने विदित नारी मन को ?
करा रहा है बस अपमान इसका
कभी पिता, कभी पति, कभी प्रेमी, कभी पुत्र बन कर.
नारी  जीवन करूणा से भरा
कैसे छिपे इसकी अनंत व्यथा
आज धरा को बता  दो
समेट ले अपनी सब सत्ता
देखते हैं, यह  नर कब तक
करेगा विकृत नारी सम्मान को,
ना होगी नारी
ना होगी कोई अभिप्रेरणा इसका झूठा आडम्बर
नहीं करा सकेगा तब
मानसी भाव को बेबस
हे ईश!
मिटा दे नारी को इस धरा से
दे नर को बस नर का दान
बचा लें यहाँ नपुंसक अपने घर का मान.

लेखिका मनु मंजू शुक्‍ला अवध रिगल टाइम्‍स की संपादक और समाज सेविका हैं.

Comments
ADD NEWSEARCHRSS