Sunday, June 13, 2010

नारीत्व का अभिशाप झेलती नारी

नारीत्व का अभिशाप झेलती नारी


नारी की गौरवगाथा आकाश को चूमे या पतन से आकाश काँपे पर सत्य यही है की नारी के लिए ना सावन सूखे ना भादों हरे ! वो कल जैसी थी आज भी वैसी ही है! उसे बस त्याग , संयम तथा आत्मदान की आग में अपना व्यक्तित्व को बस जलते ही समाज देखना चाहता है ! जीवन भर वो त्याग करुण की मूर्ति बनी रहे ये समाज देखना चाहता है !


अपने आप को पतिपरायण प्रमाणित करने के लिए सीता जैसी नारी को भी अग्निपरीक्षा देनी पड़ी! अनंत त्याग के बाद भगी नारी नारी ही रही ! पुरुष बस उस पर अपना पौरुष दिखाता रहा है! सच तो ये है की नारी के स्वभाव की कोमलता के आवरण में दुर्बलता छिप गयी वही उसकी स्वीकारता बन गयी और इसी दुर्बलता को अपना अलंकार समझती रही पर सच यह है कि दुर्बलता मनुष्य जीवन की रही है और रहेगी यदि शरीर और मन दोनों ही दुर्बल हो तो वो घोर अभिशाप है ! यही अभिशाप युगों से नारी झेल रही है !

नारी ने अपनी शक्ति की ना कभी जाना और ना ही कभी जानने का प्रयास किया !नारीत्व को सदैव कोमलता का प्रतीक माना गया है यही कोमलता नारीत्व भाव के लिए करुनतम भाव बन कर रह गया न!पुरुष हमेशा से उसे अपने अधीन करता आया है और करता रहेगा समय बदल सकता है सोच का कालचक्र नहीं
एक बार जरथूस्त्र ने एक बुढ़िया से पूछता है-" बतायो स्त्रियों के बारे में सच क्या है ?"
बुढ़िया ने उत्तर दिया -"बहुत सी सच्चाईयां ऐसी हैं जिनके बारे में मौन रहना बेहतर है ! हां अगर तुम औरत के पास जा रहे हो तो अपना कोड़ा साथ ले जाना मत भूलना"
सा च तो यही है कि कई सदियों से चला आ रहा यही पुरुष का संस्कार है पुरुष नारी को जोप समझता है इन पंक्तियों में स्पष्ट है
सच यह है की पुरुष ने नारी को दो भागों में बांटा है कमर के ऊपर या कमर के नीचे !
कमर के ऊपर नारी स्वरुप महिमामयी, करुणामयी, मंजुमायी, अनुरागमयी और कमर के नीचे कन्दरा, कुंतिस्त ध्वस्कारिणी, काम्वासिनी इत्यानंत
वो नारी को सम्पूर्णता से नहीं देख सकता! कैसी विचित्र विडम्बना है! सच! नारीत्व अपने में बड़ी ही विचित्र बात है! जिसपर पुरुष हमेशा से विजय प्राप्त करने कि छह रखता रहा है ओइर रखता रहेगा चाहे प्रेमवश चाहे विवशतावश पुरुष हर समाज में उसे तोड़ता आया है उसने कभी भी नारी को नारी से जुड़ने नहीं दिया कारण तोड़कर ही किसीको कमज़ोर या पालतू बनाया जा सकता है
तभी बोउवा कहते हैं "औरत पैदा नहीं होती बनायीं जाती है "

पुरुष नारी को केवल शरीर के उपभोग मात्र समझता आया है इसलिए हर तरह से उसे सेक्स को नियंत्रित करना चाहता रहा है और यह समाज का कटु सच है कि नारी को बस शरीर मात्र बनाकर इस समाज में छोड़ दिया गया है आज भी वह शरीर मात्र के सिवाय कुछ भी नहीं है इसके अलावा आज के परिवेश में उसकी व्यक्तिगत पहचान खो चुकी है
पन्त जी कहते हैं "योनी मात्र रह गयी है मानवों"
कंकाल उपन्यास में प्रसाद जी ने यह स्वीकार क्या है "पुरुष नारी को उतनी ही शिक्षा देता है जितना उसके स्वार्थ में बाधक ना हो साहित्य और समाज नारी को हमेशा से हीन भावना से देखता आ रहा है प्रसन्न होने पर वही पुरुष उस पर कविताएँ लिखता है और प्रसन्न न होने पर उसे चांडलीन और कुलटा बना देता है ! जिन नारियों ने अपने मन और शरीर अपने पतियों ,स्वामियों और अभिभावकों तक सिमित नहीं रखा या यूं कहें जो स्वतंत्र विचारों कि महिलाएं रहीं वो समाज कि नज़रों में बुरी व गन्दी बनी और उनकी स्वतन्त्रता कि सज़ा मौत बनी या समाज ने उसे स्वीकार करने से मना कर दिया
स्ववीर निर्विकार ने कहा है " वैश्य स्वतंत्र नारी है "
मतलब नारी को अगर स्वतंत्र होना है तो उसे वैश्या बन्ने के सिवाय कोई भी चारा नहीं है अकेली नारी कहीं भी नहीं रह सकती क्योंकि यदि नारी को संरक्षण अपना नाम देता है तो वो बेटी, पत्नी या माँ कहलाती है और यदि संरक्षण तो दे पर नाम न दे तो समाज कि नज़रों में उसे रखें कहा जाता है और यदि संरक्षण ना हो तो वो वैश्या कहलाती है ! इसीलिए आज भी उसके जीवन कि लगाम पिता, पति और पुत्र के हाथ में होती है उसका कोई भी अपना व्यक्तित्व नहीं होता " नाम, न गोत्र, न गृह वो तो खानाबदौश होती है "
आज भी किसी नारी में ताकत नहीं कि वो इन संबंधों से बाहर आकर खुले आसमान में जी सके
मीरा इसीलिए विद्रोनी कही गयीं उन्होंने इश्वर और भक्ति के मध्य अपने आपको इन मानवीय संबंधो से मुक्त क्या ना वे वैश्या बनी और ना ही आत्महत्या का मार्ग चुना और स्वतंत्र होकर जी पर फिर भी उन्हें मृत्युदंड मिला कितनी विचित्र बात है नारी के लिए सबसे बड़ा उदाहरण है रघुवीर सही कि यह कविता बेहद सुन्दर ढंग से नारी के व्यक्तित्व को रखती है "पढ़िए गीता / बनिए सीता/ फिर इन सब में लगा पलीता /निज घरबार बसिए छोड़ कातिला /लकड़ी सिली /आँख गीली/ घर कि सबसे बड़ी पतीली/ भर भर भात पकाइए
सच तो यह है कि आज भी किसी नारी के मस्तिष्क से सिन्दूर धुल जाए उसके जीवन से मंजू संसार उद्द जाता है यह आज भी ऐसा अपराध है कि उसे मृत्युदंड से भी भीश्नातर यातना भोगनी पड़ती है और अगर उसके कोई संतान है तो उसे संतान को लेकर घुप अँधेरे में खोना पड़ता है इतना होकर भी आज भी नारी इस दास्तांह से मुक्त नहीं होना चाहती और शारीरिक और मानसिक यातनाओं को झेल रही है इसका परिणाम नारी जीवन पर निरंतर बढ रही आपराधिक समस्याएं ,यौवन शोषण मृत्युदंड इत्यादि आज भी अगर अखबारों कि सुर्ख़ियों में तथा समाचारिक माध्यमों में झांक कर देखें हर एक मिनट में नारी जीवन पर यातनाएं हो रही हैं पर समाज कि निंद्रा तो मृत्यु कि महानिन्द्र से बड़ी हो गयी है कि टूटती नहीं ना लज्जा आ रही है
आज भी स्त्री समाज का स्वरुप बड़ा ही इचित्र है ना वो आगे बढ रही है ना ही किसी नारी को आगे बदने रही हैं कुछ तर्कशीलों का मत है कि नारी को स्वयं अपनी रक्षा करनी होगी पर ऐसे मत पर तो ना मुझे हंसी आती है और ना ही रोना क्योंकि नारी नारी ही रहेगी और नारी ही नारी कि सबसे बड़ी दुश्मन है तो कैसे इस दास प्रथा से मुक्त हो सकती है मजेरा मानना है कि नारी अपने झूठे भ्रम में फंसी हुई है कि वो महा शक्ति है वह त्याग कि मूर्ति बनाने का ढोंग करती आ रही है और करती रहेगी और वह इस चीज़ कि आदि रहेगी पर मैं कहती हूँ कि अगर उसने अपनी शक्ति को जान लिया तो जीवन संचेतना को बदलने में समय नहीं लगेगा और तब वह पुरुष दासता से मुक्त हो जायेगी और यह कार्य शुरू हो गया है धीरे धीरे नारी विद्रोनी होती जा रही है और समाज के नियम कानूनों को तोडती जा रही है आज मेरा यह मत है कि
नारी तुमको स्वतंत्र हो उठना है
और अपनी पहचान बनानी है
अपनी महाशक्ति को जानना है
तुम देह नहीं
तुम संपूर्ण हो
अपने पे रोना बंद करो
जीवन पथ पर चलो
और मंजु बनाओ
तुम जननी हो
तुममे धरा का अवशेष है
इसलिए तुम अपना रूप दिखाओ
विद्वान्कारिणी न बन
सृजन करता बन
काम को छोड़
ज्ञान के पथ पर चल
नए साम्राज्य का निर्माण कर
प्रेम कि प्रतिमा छोड़
ज्ञान का प्रतीक बन
आज यही है तुझसे समय कि मांग
और यही है तेरी सच्ची पहचान

2 comments:

वाणी गीत said...

अच्छा आलेख और कविता ...
मगर कहूँगी कि सबल और निर्बल ..दोनों ही प्रकृति की नारियां हर युग में रही हैं ...
@ प्रेम की प्रतिमा छोड़
ज्ञान का प्रतीक बन ...
प्रेम और ज्ञान का संतुलन होने पर कोई नारी नारी नहीं रहेगी क्या ...मुझे विश्वास है प्रेम के व्यापक स्वरुप की ही बात कर रही हैं आप भी ...प्रेम ..माँ बच्चे का प्रेम , इंसान से इंसान का प्रेम ...

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), जयपुर (राजस्थान) और राष्ट्रीय अध्यक्ष-बास/ Dr. Purushottam Meena Nirankush, Editor PRESSPALIKA,(Fortnightly) Jaipur, Raj. and N. P.-BAAS said...

यह फार्मूला जरूरी नहीं कि सौ प्रतिशत सफल हो, लेकिन सफल जरूर है!
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आपने नारी वेदना एवं समाज में पुरुष द्वारा निर्मित नारी की दुर्गति का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है। निश्चय ही आप इसमें सफल रही हैं, लेकिन स्त्री को अपने स्त्रैण गुणों को भुलाकर ज्ञान के सागर को ही सब कुछ समझ लेना और प्यार जैसे पवित्र अहसास को प्यार की प्रतिमा तक सीमित कर लेना भी अपने आपके साथ घोर अन्याय है। माना पुरुषों ने हजारों वर्षों से स्त्री के साथ घोर अपमानजनक स्थितियाँ निर्मित की हैं, जिन्हें स्त्री ने पोषित किया या स्त्री को ऐसा करने के लिये पुरुषों ने बाध्य किया, जिसके चलते स्त्री का करुण क्रन्दन दिखावटी और खोखले आदर्श के प्रमितानों में दबकर कहीं खो गया और स्त्री का अवचेतन मन पुरुष द्वारा स्वयं या पुरुष द्वारा सम्मोहित या पुरुष द्वारा शासित स्त्री के माध्यम से गढे गये आदर्शों को ही जीवन का अन्तिम सत्य स्वीकार कर कूप मण्डूप बन बैठा, लेकिन फिर भी आज स्त्री को विगत की तुलना में बहुत अवसर हैं। द्वारा खुला है, सम्भावनाएँ हैं। मेरा तो मानना है कि वर्तमान ही सत्य है और वर्तमान को अपनी इच्छानुसार समाज के सकारात्मक प्रतिमानों के खुशी से जीना ही सच्ची सामाजिक आजादी है। अत्याचारी के समक्ष, चाहे वह कितना ही ताकतवर क्यों न हो, खडे होकर प्रतिरोध करने करने का साहस एवं कानूनी स्वतन्त्रता ही सच्ची आजादी है।

वस्तुनिष्ठता किसी भी क्षेत्र में सही नहीं है, विगत में खोकर या यहाँ-वहाँ घटने वाले दर्दनाक हादसों के चलते स्वयं को व्यथित करना या अपराधबोध से ग्रस्त होना भी परोक्ष रूप से उन्हीं ताकतों को, ताकत प्रदान करना है, जो स्त्री को कमजोर एवं पतित देखना चाहती हैं। ऐसी शक्तियों को किसी भी कीमत पर मजबूत नहीं होने देना है, तब ही कालान्तर में स्त्री या प्रत्येक शोषित व्यक्ति को सच्चा न्याय मिल सकेगा।

मुझे नहीं पता कि आप इससे कितनी सहमत होगी, लेकिन मेरी जितनी समझ है, उससे मुझे तो यही सूझता है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विजय श्री हासिल करनी है तो जरूरी है कि अपने आपको कमजोर मत बनने दो और दुश्मन को कभी न तो कमजोर समझो और न हीं स्वयं को दुश्मन की दृष्टि में कमजोर प्रतीत होने दो। यह फार्मूला जरूरी नहीं कि सौ प्रतिशत सफल हो, लेकिन सफल जरूर है!

शुभकामनाओं सहित।
आपका
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश
सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है।
इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, सरकार या अन्य किसी से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३६४ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६
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