Friday, February 18, 2011

मेरे हाथो में सजी दुल्हनपुर की गुलाबी चूडिया



तुम्हें पता है मेंरे हाथो में सजी
वो तुम्हारी दी हुई चूडिया


आज ऐसे खनकने लगी
जैसे रात शबनम में लिक्खी हुई
शोख़ियों से हिलता पत्ता
हवाओं ने सुर दे दिया हो

जोड़ देती है हमें तुमसे
हर पल हर घड़ी
इनकी खनखनाहट

तुम्हें पता है
इन चूडिया में
तुम्हारी प्रीत की "खन-खन"
बार बार संगीत बन
तुम्हारे निस्ब्दो भरे स्वरों को सुना देती हैं

जब भी हवाए छुती है इन्हें
मुझे तुम्हारे होने का अहसास कर देती है

आज देखो हजारो दामनिया
मेरी गोरी कलाई पर सज के
मुस्कुरा रही है
बाहों में आयेगी
मेरे बहरो की हंसी
यह तो कभी सोच ही ना था

खुली आँखों से जो सपनो को मैने कभी
हार पर टूटते सपनो में खुद को बिखरते देखा था
नहीं सोचा था
कोई इतना सवारे गा
पर आज साची डोर हरदम खिचती है हमें प्रीत की ओर
मीरा सी मै पगली खिची जारही नाजाने किस ओर

3 comments:

आशीष तिवारी said...

bahut hi accha likha hai aapne.

Anonymous said...

Bahut hi sundar lkha he. I like this.

BALMUKUND said...

janab kabita jitne achchhi hai ager hindi bhi hoti to lajabab hota. ......but sochte achchhaho.