Monday, August 1, 2011

मै तुम्हारे लिया एक कविता लिखना चाहती हूँ




अपनी उन तमाम कवितो को हटा
मै तुम्हारे लिया एक कविता लिखना चाहती हूँ
वो कविता जो जीवित हो
वो कविता
जो सूरज की रोशनी से किरने चुरा कर
हजारों दीयो को जलादे
वो कविता
जो भटके को रास्ता देखाए

पता है तुम्हें
जब भी तुम्हारे साथ चलती हूँ
तो भूल जाती हूँ
अपने आतीत, वर्तमान और भविष्य को
बस तुम और तुम्हारे शब्द याद रहते है
भुलजाती हूँ मृयादो को
सिर्फ तुम और तुम तुम्हारी बातो को याद रखती हूँ
जब जब मै कुछ पल के लिये मै कमजोर होती हूँ
तुम मुझे थम लेते हो
और दिखादेते हो मेरी ऊची
जाता देते हो मेरी मुझसे पहचान
सच है मै जानती हूँ
बहुत जली हूँ , पछतावे की आग में
पर अब
मै जीना चाहती हूँ , तुम्हारे साथ
उचाईयो को छुना चाहती हूँ ,तुम्हारे साथ
जो कभी सपने मेरे दुवार तक आ के खोगये थे
अब मै उन्हें फीरसे देखना चाहती हूँ
पलाश के फुल सा सूरज की भूप में दहकना चाहती हूँ
बस तुम्हारे साथ
बस तुम्हारे साथ
सच तो यह है, अब मै
एक तुम्हारे लिया कविता लिखना चाहती हूँ
मै अब लिखना चाहती हूँ
जो जोड़ दे देश को देश से
समाज को समाज से
इन्सान को इंसानियत से
नहीं लिखना कहती अधरा विरानिया फुल बदल
मै लिखना चाहती हूँ
तपते रागिस्तानो में तुम्हारी जीत की
मै लिखना चाहती हूँ
हजारो के लिया किया गए तुम्हारे संघर्स के
आज भी जब मै लिख रही हु तो भूल गई हूँ
उन तम बातो को जो मुझे दुखी करती है
बस याद है तुम्हारी दिखाई सुबह
और फूलो पे मडराती हंसी

एक तुम्हारे लिया कविता लिखना चाहती हूँ


2 comments:

mahendra srivastava said...

बहुत सुंदर
क्या बात है

anu said...

waah bahut man ke bhav......waah