Sunday, October 30, 2011

देख अब धरती पनाह मागती


लहु से लाल धरती 
जख्मो में कराहती 
खुद से  बेचैन हो

अपने खुदा के सामने 
देख अब धरती पनाह मागती 

बतियों  की अस्मतो खलते  रावन 
कैसे  माँ रोये नहीं 
क्यों नहीं कराहती ?
ज्ल्रह बचपन कापती इंसानियत 

अपने खुदा के सामने 
देख अब धरती पनाह मागती 

भूख से   रोते बच्चे 
वीरान हो बंजर जमी 
गर्भ में कराहती 
दर्द को समेत तन में 
रोती चिल्लती 

अपने खुदा के सामने 
देख अब धरती पनाह मागती 

जुल्म के बोझ को 
अब  न वो  सह पायेगी 
बस्तिया अश्को के शैलब से
 युही भर्ती जाएगी  
देखना एक  दिन धरा 
खुदा के गर्भ मे युही समा जाएगी 
थक गयी है आज धरती 
सोचती पुकारती 
               अपने खुदा के सामने 
       देख अब  धरती पनाह मागती 

9 comments:

Dinesh Mishra said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति .........!!

anju(anu) choudhary said...

bahut khub........man ko chu lene wali kriti

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर,
क्या कहने

inqlaab.com said...

aap sabka sukriya

देवेन्द्र said...

सच्चाई कुछ ऐसी ही है कि आँखे नम हो जायें। भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

Suman said...

लहु से लाल धरती
जख्मो में कराहती
खुद से बेचैन हो.nice

inqlaab.com said...

aap sabhi ka dhnye vad

इंकलाब said...

समस्याओ को लोगो के जेहन में बैठना ही आज के समय में समाज सेवा है बहुत अच्छे !

इंकलाब said...

समस्याओ को लोगो के जेहन में बैठना ही आज के समय में समाज सेवा है बहुत अच्छे !