Friday, July 23, 2010



हे ईश्वर












मैने अपनी पराजय सुविकार कर ली

हैइसलिये नहीं की मै कमजोर

हूँइसलिये नहीं की मै ताकतवर हूँ

इसलिये नहीं की मै अकेली

हूँइसलिये नहीं की मै हारी हूँ


बल्कि इसलिये की मुझे रचना है

एक नव इतिहास

मुझे इस समाज को बताना है

नारी नारीत्व का सत्य रूप

हैनारी मंजू प्रकाश है प्रभात है


यह एक सृजन करता है

यही है पेरणा प्रकाश की


कोई भी कपुरुष नहीं विछेदित नहीं

कर सकता मेरे रूप को

नहीं तोड़ सकता मेरे अस्तित्व को

मैने जीवन को दिया है जीवन दान

मैने ही सतीत्व से रचा है यह संसार

मै अभिवक्ति हूँ मतत्व प्रेम की

मे सोम्य हूँ चन्द्रमा के प्रतीक की

मै सत्य हूँ निष्काम की

मै अभिपेरणा हूँ अभिव्यक्ति की

मै अनुराग हूँ अनुराग का

मै समवेदना हूँ अभिप्राय का

2 comments:

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush' said...

सुन्दर रचना, गहरे में जाकर ह्रदय को छूने वाले भाव. शुभकामनाएं!

अरुणेश मिश्र said...

कम्पोजिंग मे गलतियाँ ठीक करो ।
रचना नारी की अपरिमित शक्ति को व्यक्त करती है ।